गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

0 अम्बेडकर जयंती

 ||ओ३म्||





आज अम्बेडकर जयंती है।
वैचारिक तौर पर मैं उनसे बहुत से विषयों पर सहमत नहीं हूँ,
पर जातिवाद और उंच नीच के बेड़ियों को तोड़ने का उनका प्रयास सराहनीय है।
ऐसे समय में जब दलित भाइयो को चलते समय अपने हाथ में एक कटोरा और दूसरे हाथ में झाड़ू लेकर चलना पड़ता था ताकि
रास्ते में उनके पैरो के निसान न पड़ जाये और अगर मुह में थूक आये तो हाथ में लिए हुए कटोरे में थूकना पड़ जाये तो आप सोच सकते है

बुधवार, 23 मार्च 2016

0 वेद

|| ओ३म् ||

 



वेद –
केवल वेद ही हमारे धर्मग्रन्थ हैं ।
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वेद संसार के पुस्तकालय में सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं ।
वेद का ज्ञान सृष्टि के आदि में परमात्मा ने
अग्नि , वायु , आदित्य और अंगिरा – इन चार ऋषियों को एक साथ दिया था ।
वेद मानवमात्र के लिए हैं ।
वेद चार हैं ----
१. ऋग्वेद – इसमें तिनके से लेकर ब्रह्म – पर्यन्त सब पदार्थो का ज्ञान दिया हुआ है ।
इसमें १०,५२२ मन्त्र हैं ।
मण्डल – १०
सूक्त -१०२८
ऋचाऐं – १०५८९ हैं ।
शाखा – २१
पद – २५३८२६
अक्षर - ४३२०००
ब्रह्मण - ऐतरेय
उपवेद – आयुर्वेद
२. यजुर्वेद – इसमें कर्मकाण्ड है । इसमें अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन है ।
इसमें १,९७५ मन्त्र हैं ।
अध्याय – ४०
कण्डिकाएं और मन्त्र -- १,९७५
ब्रह्मण – शतपथ
उपवेद - धनुर्वेद

सोमवार, 21 मार्च 2016

0 जीव हत्या पाप नहीं।

||ओ३म्||


मित्रों, आप इस लेख के शीर्षक को देख कर चौंक गए होंगे और सोच रहे होंगे कि ये क्या अनर्गल बात है।
'संजय ' पागल हो गया है या नशे में लिख रहा है ?
पर मित्रो मैं बिलकुल ठीक हूँ और उम्मीद करता हूँ  कि इस लेख को आखिरी तक पढ़ते पढ़ते आप भी मुझसे सहमत होंगे।
ईश्वर ने हमे हर कार्य करने की आजादी दी है यहाँ तक कि हम क्या करे क्या खाये सभी में हम स्वतंत्र है, ईश्वर की तरफ से हम पर कोई रोक टोक नहीं है।
पर सभी कर्मो के फल पाने में हम परतंत्र है ये विषय ईश्वर के अधीन है हमारे अच्छे बुरे कर्मो का फल हमे समयानुसार मिलता रहता है और रहेगा।
पर प्रश्न ये है कि फिर ये पाप पुण्य का क्या चक्कर है ?
क्योंकि आये दिन हमे शाकाहारी मित्रो द्वारा सुनने को मिलता है कि जीव हत्या पाप है और मांसाहारी कहते है कि फिर तो तुम भी पापी हो क्योंकि पेड़ पौधों में भी जीव होता है।
फिर एक बहस और तर्क कुतर्क का दौर चलता है पर अंत में उत्तर कुछ नहीं निकलता दोनों पक्ष अपनी डफली अपना राग अलापते रहते है।
चलिये अब इस विषय को किसी और दृष्टिकोण से समझते है।

शनिवार, 19 मार्च 2016

0 भारत माता की जय

|| ओ३म्  ||


आज एक अहम् और गंभीर विषय पर कलम उठा रहा हूँ।
मातृभूमि और जननी माता हमें जीवन एवं पोषण देती है।
अब हम अपनी जननी माता की जय उनका सम्मान क्या संविधान से पूछ कर लगाएंगे ?
क्योंकि संविधान में भारत माता की जय करना नहीं लिखा इसलिए क्या मातृभूमि की जय नहीं बोल सकते ?
ओवैसी जैसे कट्टरपंथी का बयान देना केवल अपनी राजनीती जमीन तैयार करना है और कठमुल्ले इसका फायदा उसे देंगे भी,
पर क्या एक राष्ट्र में ऐसे मातृविरोधी विचारो को पनपने देना चाहिए ?

0 मनुस्मृति और वामपंथी आजादी

||ओ३म्||

 
गुलाम देश में आज़ादी के मायने कुछ और थे,
पर आज आज़ादी के नाम पर केवल दंगे भड़काने का कार्य हो रहा है।
किसी ग्रन्थ(मनुस्मृति) में आपका विश्वास न हो तो क्या आप हिंसा पे उतर आएंगे और उसे जलाने का दुसाहस करेंगे।
तो याद रखना हिन्दू कौम सहनसील है कायर नहीं,

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

0 जातिवाद और हम

|| ओ३म् ||



आज हर जगह जातिवाद पर तांडव मचा हुआ है।
खास करके यूपी और बिहार में, सभी इसके साइड इफ़ेक्ट से अछूते नहीं है।
पर क्या कारण है की हम चाह कर भी इसे दूर नहीं कर पा रहे है? क्यों हम इस कैंसर रूपी बीमारी से निजात पाने का प्रयास नहीं कर रहे है ?
जो ब्राह्मण है वो खुद को श्रेष्ठ कहते है और शुद्रो को नीच कहते है।
पर क्या सिर्फ जन्म से ब्राह्मण होने से ही कोई श्रेष्ठ हो जाता है ?




हमारे यहाँ तो वेदों में वर्ण व्यवस्था दी गयी है।
जिसमे साफ़ कहा गया है की कर्म के अनुसार ही उपाधि दी जायेगी,
यानि की कोई ब्राह्मण का कार्य करे तो ब्राह्मण कहलायेगा।
अगर कोई ब्राह्मण के घर जन्मा शुद्र्वत कार्य करे तो वह शुद्र कहलायेगा।
इसलिए तो वेदों में श्रेष्ठो को आर्य की उपाधि दी गयी है।
आर्य शब्द श्रेष्टता का द्योतक है | और किसी की श्रेष्ठता को जांचने में पारिवारिक पृष्ठभूमि का कोई मापदंड हो ही नहीं सकता क्योंकि किसी चिकित्सक का बेटा केवल इसी लिए चिकित्सक नहीं कहलाया जा सकता क्योंकि उसका पिता चिकित्सक है, वहीँ दूसरी ओर कोई अनाथ बच्चा भी यदि पढ़ जाए तो चिकित्सक हो सकता है. ठीक इसी तरह किसी का यह कहना कि शूद्र ब्राह्मण नहीं बन सकता – सर्वथा गलत है |
इसलिए मित्रों आओ और इस जातिवाद के जंजीर को तोड़ खुद को श्रेष्ठ बनाये, खुद को आर्य बनाये।
वेद में आदेश भी दिया हुआ है
"कृण्वन्तो विश्वमार्यम्"
अर्थात सम्पूर्ण विश्व को आर्य (श्रेष्ठ) बनाओ।

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

0 ईश्वर तो पागल ही होना चाहिए !

अनेक संप्रदायों का इस प्रकार है:
- इश्वर न्यायी, दयालु और परिपूर्ण है|
- यह हमारा पहेला और अंतिम जीवन है|
- इश्वर हमारी कसौटी ले रहा है|
- और इस कसौटी के परिणाम के आधार पर इश्वर हमें स्वर्ग में या तो नर्क में भेजता है|

संप्रदायों में थोड़ी सी ही भिन्नता है:
- कसौटी के प्रकार और उसका मापदंड|
- स्वर्ग और नर्क का वर्णन|
- कसौटी में खरा उतरने के लिए जरुरी जनुन या कट्टरपन की हद|

पर ये निश्चित रूप से मानते है कि, हमें एक ही जीवन मिलता है, हमारा यह जीवन इश्वर द्वारा ली जाने वाली एक कसौटी है और इस कसौटी के परिणाम के आधार पर इश्वर हमें हमेशा के लिए स्वर्ग में या तो नर्क में भेजता है|
अब हम तर्कपूर्ण प्रश्नों और उदाहरणों द्वारा संप्रदायों की मान्यताओं का विश्लेषण करेंगे और देखेंगे कि यह मान्यताएं कितनी हद तक सच्ची और विश्वसनीय है|
१. माँ के गर्भ में ही काफ़ी सारे बच्चों की मृत्यु हो जाती है| तो फ़िर यह बच्चे मृत्यु के बाद कहा जायेंगे? स्वर्ग में या नर्क में?
इन संप्रदायों के विद्वानों का मानना है कि ये बच्चे स्वर्ग में जायेंगे क्योंकि इन बच्चों ने अपने जीवन में कभी कोई बुरा काम नहीं किया|
पर मेरा प्रश्न यह है कि, क्या इन बच्चों को अपने जीवन में कोई गलत काम करने का एक भी मौक़ा मिला था?